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Megician Ashok Gahlot : अशोक गहलोत वो जादूगर जो बाइक बेचकर बना राजस्थान का मुख्यमंत्री

Megician Ashok Gahlot : आज कहानी राजस्थान के उस जादूगर की जो संजय गांधी के बेहद करीब माना जाता था। कई महीनों तक राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को जादू दिखता और परिवार के करीब आता। महज चार हजार रूपए में अपनी बाइक बीच दी और फिर कदम राजनीति में मतलब सियासत की शुरुआत की। चुनाव लडा हार मिली फिर भी केंद्रीय मंत्री बने । धीरे धीरे कारवां बढ़ता गया लंबा सफ़र तय हुआ और बन गए राजस्थान के मुख्यमंत्री। हम बात कर रहे है मौजूदा समय के राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की जिन पर सोनिया गांधी राजस्थान की सियासत में सबसे ज्यादा भरोसा करती है ।

सियासी खेल के पीछे खेल क्या होता है कैसे होता है यह बात उस जादूगर को पता थी। अशोक गहलोत(Megician Ashok Gahlot)  का पॉलिटिकल करियर डार्क हॉर्स की गाथा है गहलोत राजनीति तौर पर बहुत ही अप्रभावी माली बिरादरी से आते है इसके बावजूद उन्होंने अपनी पहचान को कभी गांधी परिवार के सामने धूमिल नहीं होने दिया । लेकिन साल 1993 मे गांधी परिवार की प्रसंगीगता सवालों के घेरे में थी । पीवी नरसिम्हा राव सत्ता के शिखर पर थे तब पीवी नरसिम्हा राव एक तांत्रिक के अहसान तले दबे थे । वह तांत्रिक जो सबसे ज्यादा सत्ता का तंत्र समझता था। जिसे कई आलोचक त्रिपुंड वाला दलाल भी। कहते । जिसने सियासत से रिटायरमेंट तैयारी करते पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी तक कर डाली थी। वो कोई और नहीं चंद्रास्वामी थे पीवी नरसिम्हा राव सरकार में ऐसा रसूख था कि कई मंत्री उनके पांव छुते थे ।

Megician Ashok Gahlot :
Megician Ashok Gahlot :

जब चंद्रास्वामी और अशोक गहलोत एक साथ मिले तो क्या हुआ

एक बार राव के तांत्रिक चंद्रास्वामी और अशोक गहलोत एक ही फ्लाईट में सवार थे । स्वामी के साथ उनके कई चेले थे । वह सभी तिरछी निगाह से देख रहे थे कि दूसरे मंत्रियो की तरह अशोक गहलोत भी चंद्रास्वामी का सजदा करेंगे । लेकिन ऐसा कुछ गहलोत ने किया नहीं । दोनों के बीच रिश्तों में खटास कि पहली बूंद पड़ चुकी थी कुछ महीनों बाद राजस्थान के एक पाली जिले में एक कार्यक्रम होने जा रहा था । इस कार्यक्रम ने विसी शुक्ला और अशोक गहलोत थे । पता चला इस कार्यक्रम में चंद्रास्वामी भी आने वाले है फिर गहलोत ने अचानक मना कर दिया। चंद्रास्वामी बेहद नाराज हुए ।

कार्यक्रम में ना आने की कीमत अधिक गहलोत (Megician Ashok Gahlot) को चुकानी पड़ी । कुछ समय बाद पीवी नरसिम्हा राव के मंत्रिमंडल से गहलोत को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया । गहलोत और अन्य पार्टी के लोगो को समझ आ गया की यह सब चंद्रास्वामी के इशारे पर हुआ है। स्वामी की बात को कभी राव काटते नहीं थे। शायद इस बार भी नहीं काटा होगा। गहलोत दिल्ली से राजस्थान आए तो 1993 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हार झेलनी पड़ी ।गहलोत ने मदेरणा जो प्रदेश कोंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। उनकी सीट पर आंखें जमा की और तख्तापलट की सोची । तब गहलोत ने एक ऐसे आदमी को साथ लिया कभी जिसका तख्तापलट किया था। मदेरणा की मदद से हरदेव जोशी पूर्व मुख्यमंत्री अब नेता प्रतिपक्ष थे ।

अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने या बनाया गया

इसमें दो बातें उभरी है पीछे जो हलचल मची थी उसी देखते हुए यह कहना कठिन था कि अशोक गहलोत के पास राजस्थान की कमान आयेगी । साल 1998 में राजस्थान में फिर विधानसभा चुनाव हुए। तब केंद्र में बीजेपी सरकार थी अटल बिहारी वाजपेई पोखरन मे परमाणु धमाके कर चुकी थी। देश में प्याज के दाम आसमान पर थे और राजस्थान में जाट आरक्षण आंदोलन उफान पर था। गहलोत जोधपुर से सांसद और प्रदेश कांग्रेस के सदर थे। 200 विधानसभा में गहलोत ने 160 विधानसभा क्षेत्र में रैली कि । भैरो सिंह शेखावत को घेर रहे थे। चुनाव के परिणाम आए जनता ने बीजेपी को बाहर का रास्ता दिखा दिया । कांग्रेस 200 मे 153 सीट जीतने में सफल रही ।

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अब समय आ गया था विधायक दल के नेता और सूबे के मुख्यमंत्री के चुनाव की । जाट अब सरकारी नौकरी के अलावा सरकार मे भी हिस्सा मांग रहे थे। मुख्यमंत्री की रेस में पहला नाम परसराम मदेरणा थे जो पूर्व कांग्रेसी थे दूसरा नाम नटवर सिंह का था। गांधी परिवार के करीबी थे । सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष थी। 30 नवम्बर 1998 को सुबह विधायक दल की बैठक शुरू हुई। होटल में चहल पहल थी सब अपनी बात रख रहे थे। मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए। तभी अशोक गहलोत दफ्तर पहुंचे । गहलोत के चारो तरफ पुलिस का घेरा था। जो विधायक आता गहलोत को तोहफे देता। गहलोत मुस्कान के साथ सब स्वीकार करते जाते। मदेरणा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी का दावा छोड़ दिया। और फिर अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए। इससे पहले अशोक गहलोत अपनी एक बाइक को बेचकर संजय गांधी से टिकट लिया था लेकिन जनता पार्टी के माधों सिंह से चुनाव हार गए ।

गहलोत की बोहनी खराब हुई फिर 1980 मे चुनाव हुए तो जोधपुर से लोकसभा टिकट मिला और चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंच गए । तब गहलोत को दिल्ली की कैबिनेट  का विस्तार हुआ। 31 की उम्र में अशोक गहलोत को उद्द्यन मंत्रालय का उप मंत्री बनाया गया। इसके बाद अशोक गहलोत राजनीति में ऐसे जमे की वापसी का इरादा तक नहीं किया। आज राजस्थान के मुख्यमंत्री है ।

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