कल कहा था, ‘मैं विकास दुबे कानपुर वाला’, आज ढेर

नई दिल्ली।  सप्ताह भर चले विकास दुबे घटनाक्रम का आज अंत हो गया। कल तक फिल्मी स्टाइल में खुद का नाम लेने वाला विकास आज पुलिस मुठभेड़ में मारा गया।  कल जिस तरह से उज्जैन से उसकी गिरफ्तारी हुई थी, इससे साफ लग रहा था कि वह एनकाउंटर में मारे जाने से बच गया है लेकिन आज सुबह फिल्मी स्टाइल मुठभेड़ में ही उसका अंत हो गया।

हो सकता है इस मुठभेड़ पर कई सवाल हो लेकिन विकास जैसे अपराधियों का समाज के लिए मर जाना ही बेहतर है। उसने जिस तरह से आठ पुलिस कर्मियों की हत्या की थी पर पूरी तरह से अक्ष्म्य अपराध था।

विकास लगभग सात दिनों तक पुलिस को चकमा देता रहा लेकिन इस दौरान उसके कई साथी भी मारे गए। पुलिस ने इस दौरान ताबड़तोड़ एनकाउंटर किए और उसके गिरोह का लगभग अंत कर दिया।

इन सबके पीछे बड़ा सवाल ये है कि इस इस तरह के अपराधी आखिर पनपते कैसे है। कैसे  कोई अपराधी आज के दौर में भी बेखौफ होके लगातार अपराध करता है। जिस तरह से पुलिस की ओर से मुखबिरी और तमाम नेताओं के साथ उसके संबंध सामने आ रहे है, वह  फिल्म ‘वास्तव’ के संजय दत्त के किरदार की याद दिलाते हैं। जिस तरह से फिल्म में एक सड़कछाप गुंडा एक नेता की शह पाकर दिनदहाड़े आंतक मचाता है, उसी तरह से इसमे कोई शक नहीं कि विकास के पीछे भी नेताओं का हाथ जरुर होगा।खैर अब ये राज भी उसकी मौत के साथ दफन हो गया।

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