जानिए कैसे भारत सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को रोकने की दिशा में बड़ी पहल करने जा रहा

Once used, plastic that turns into garbage is becoming a serious environmental crisis. This problem extends from the depth of the sea to the height of the Himalayas. Plastic bags are used on a large scale in the world, India, so much that it can cover twice the geographical size of France. It has been told in many research that it takes thousands of years for this plastic reaching the depths of land and sea to decompose.

विनोद कुमार

नई दिल्ली. एक बार इस्तेमाल होने के बाद कूड़े में बदल जाने वाला प्लास्टिक गंभीर पर्यावरणीय संकट बन रहा है. यह समस्या समुद्र कि गहराई से लेकर हिमालय कि ऊंचाई तक फैला हुआ है.दुनिया भारत में व्यापक पैमाने पर प्लास्टिक थैले का इस्तेमाल होता है, इतना कि उससे फ्रांस के दोगुने भौगोलिक आकार को ढंका जा सकता है. कई अनुसन्धान में बताया गया है कि जमीन और समुद्र कि गहराई में पहुंच रहे इस प्लास्टिक को विघटित होने में हज़ारो वर्ष लग जाते हैं.

single use plastic

मिट्टी, पानी को दूषित करने वाला प्लास्टिक पर्यावरण और जीव जंतुओं के लिये आपदा बन रहा हैं. भारत सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को रोकने कि दिशा में बड़ी पहल करने जा रहा है. प्लास्टिक इस्तेमाल के तौर तरीकों और उसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव के आकलन के आधार पर केंद्र सरकार की एक समिति ने कुछ प्रस्ताव दिये हैं. नया मसौदा वर्ष 2016 में अधिसूचित और 2018 में संशोधित मौजूदा नियमों को प्रतिस्थापित करेगा.

मसौदे में 1 जनवरी,2022 से एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक के उत्पादन, आयात, भंडारण, वितरण और बिक्री पर रोक संबँधी प्रावधान है. तीन चरणों में एकल उपयोग प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक प्रभावी ढंग से लागू कि जाएगी.प्लास्टिक स्टिक, गुब्बारे, थर्माकोल, प्लेट, कप, कटलरी, स्ट्रा, प्लास्टिक पैकेट और बैनर्स आदि को सिलसिले वार तरीके से प्रतिबंधित किया जायेगा. आखिरी चरण में 240 माइक्रोन से कम मोटे बिना बुनाई वाले बैग आदि प्रतिबंधित किये जायेंगे.इलेक्ट्रिकल फिटिंग, टेबलवेयर में प्रयोग होने वाले थर्मासेट, प्लास्टिक और खिलौना, कंघी और मग में इस्तेमाल होने वाले थर्मोप्लास्टिक पर भी पहली बार प्रतिबन्ध लगाया जायेगा.

समिति ने उपयोगिता (स्वछता, उत्पाद, सुरक्षा, अनिवार्यता, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव ) और पर्यावरणीय प्रभाव
(एकत्रीकरण, पुर्नचकरण, समाधान कि संभावना, वैकल्पिक सामग्री का पर्यावरणीय प्रभाव और कूड़े कि प्रवृति ) के अहम कारकों का अध्ययन किया है. प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने कि दिशा में निश्चित ही यह बड़ा और महत्वपूर्ण कदम है.हालांकि, कचरा बीनने वालों के लिए आजीविका कि वैकल्पिक व्यवस्था पर भी हमें गौर करना होगा.देश में प्लास्टिक पुर्नचकरण  काम से लगभग 15 लाख कूड़ा बिनने वाले जुड़े हुए हैं.

न्यूनतम प्लास्टिक उपयोग वाली अर्थव्यवस्था कि तरफ बढ़ते हुए शुरुआत उन प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध से होनी चाहिए, जिनका पुर्नचकरण नहीं किया जा सकता. भारत में सालाना 94.6 लाख टन कचरा निकलता है.केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के अनुमान के मुताबिक रोजाना निकलने वाले 25,940 टन कचरे में से मात्र 15,384 टन ( लगभग 60 फीसदी ) ही इकठ्ठा और पुर्नचक्रित किया जाता है, बाकि बचा हुआ प्लास्टिक पर्यावरण में फ़ैल जाता है, जो खतरा पैदा कर रहा है. सिंगल यूज़ प्लास्टिक के कूड़े से होने वाले नकारात्मक प्रभाव के प्रति लोगों में जागरूकता कम है. इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से व्यापक उपभोक्ता जागरूकता अभियान चलाना होगा, ताकि लोगों के आदत में बदलाव आ सके.

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं और पर्यावरण को लेकर लगातार लिखते रहते हैं)

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