Freebies Politics : क्या मुफ्त की राजनीति से देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी?

Freebies Politics  : साउथ से लेकर पूरे देश में सियासतदानों ने फ्री की राजनीति का ऐसी पाठशाला खोली है जिसमें जनता बड़ी संख्या में इस क्लास में दाखिला लेने से नहीं चूकती । भारत की जनता को सबकुछ फ्री में मिल जाए तो उसे अपने देश की अर्थव्यवस्था चरमरा क्यों न जाए । ये ऐसी बातें शायद जनता न जानती और समझती हो लेकिन राज्य सरकारें तो जानती है कि जनता के लिए सबकुछ फ्री दिया जाएगा तो देश की हालत कैसी होगी। भारत की राजनीति में खैरात बांटने और मुफ्त की राजनीति करके मतदाताओं को ठगने और लुभाने का सिलसिला कोई नया नहीं है चुनाव में वोट से पहले राजनीतिक पार्टियां यही करती है और देश की बेजान यानी अनपढ़ वोटर तो खींचा चला जाता है हैरानी तो तब होती है कि इस लुभावन में देश का शिक्षित वर्ग भी आ जाता है.

मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना सरकारों की पुरानी परम्परा है यह जानते हुए कि इससे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। सरकार जनता से को सिक्सर लेती है देश और राज्य उसी पैसे से चलता है केंद्र सरकारों को उन सभी राज्य सरकारों को चेताना चाहिए जो कर्ज चुकाने की क्षमता खोते चले जाने के बाद भी मुफ्त की योजनाओं को बढ़ावा दे रही है यह घातक है अगर आप इसे समझे तो यह अवसर वादी और स्वार्थ की राजनीति को पनपने का जरिए है अगर सरकारें इसी तरह मुफ्त की राजनीति करती रहीं तो देश वह दिन देखेगा जब 1991 मे देखा था क्योंकि राज्य सरकारें ऐसा करती है तो केंद्र पर इसका असर अधिक पड़ता है केंद्र सभी राज्यों को अलग अलग आर्थिक नियमों के तहत पैसा रिलीज करता है।

Freebies Politics:

सियासदानों को फर्क क्यों नहीं पड़ता

भारत में पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय हो गया है कि भारत में राजनीतिक दलों ने वोट बैंक कैसे अपनी तरफ किया जाता है इसका तरीका उन्होंने खोज निकाला है । इसमें राज्य से लेकर केंद्र सरकारें भी है भारत में यह कैसा लोकतांत्रिक दांचा बन रहा है जिसमें पार्टियां अपनी सीमा से उपर उठकर जनता को लुभावन वादे कर रही है इसे आप किसी तरह जनहित में नहीं कह सकते । राज्य सरकारों की कोशिश रहती है कि छोटे छोटे लुभावन वाले वादे कर जनता को खुश किया जाए जबकि उनकी जो मांगे और समस्याएं होती है उन्हे मुफ्त वाले वादे के पीछे छिपा देती है

ऐसा होने से देश के दीर्घ कालिक सामाजिक और आर्थिक हालातों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है । आपने कई बार देखा होगा कि राजनीतिक पार्टियों और नेता सत्ता के नशे में इतने धुत होकर आक्रामक हो जाते है यह स्थित चिंताजनक है । इसी मुफ्त राजनीति की वजह से आज श्री लंका की क्या हालत है आप खुद देख सकते है महंगाई और खाने पीने के समान का अकाल पड़ा है जनता में संतोष बढ़ता जा रहा है श्री लंका के नागरिक सड़को पर उतर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे है श्रीलंका में हालात बेकाबू है इससे भारत की राजनीतिक पार्टियों को सोचना चाहिए। भारत में छोटे बड़े सभी दलों के पास मुफ्त का एक पिटारा होता है जो चुनाव के वक्त ही खोला जाता है किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी को जनता की मेहनत की कमाई लुटाने के लिए नहीं बल्कि जनहित के लिए उपयोग होनी चाहिए । लेकिन शायद ही ऐसा कोई नेता या पार्टी करती हो ।

श्रीलंका से सबक लें भारत की राजनीतक पार्टियां

आज श्री लंका की आर्थिक हालत जो बिगड़ी है उसके दो प्रमुख कारण है पहली तो जनता के प्रति मुफ्त की राजनीति और दूसरी चीन का चक्रव्यूह , इन दोनों के कारण ही श्रीलंका बर्बाद हुआ है श्रीलंका में जब गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति बने तो उन्होंने वादे किए की सबका आधा टैक्स माफ कर दिया जाएगा। इसके आलावा अन्य मुफ्त की योजनाएं लागू की थी जिसके बाद सरकार के पास जनता का टैक्स कम आया । देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ती गई । श्रीलंका रुपया नीचे गिरता गया । डॉलर खत्म होने लगा । बाहर के देशों से सामान खरीदने के लिए श्री लंका के पास डॉलर बचा नहीं । जितना सामान देश में बचा वो सब महंगा हो गया । अब श्रीलंका में जनता भूख से बिलख रही है। दूसरी वजह चीन है चीन की कठोर शर्तो पर लिया गया कर्ज भी श्री लंका की बर्बादी का जिम्मेदार है श्री लंका चीन के चंगुल में फंसता गया ।

मतलब लंका ने अपने पैर में खुद कुल्हाड़ी मारी है। श्रीलंका की स्थिति को देखते हुए पीएम मोदी ने एक बैठक बुलाई । जिसमें शीर्ष अधिकारी शामिल हुए । इन अफसरों ने कहा कि कुछ राज्य सरकारें मुफ्त वस्तु और मुफ्त सेवाएं दे रहे है और उन्हें श्री लंका जैसी स्थित पैदा हो सकती है अफसरों ने यहां तक कहां की अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश की अर्थव्यवस्था का बेड़ागर्ग होना तय है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुफ्त बिजली , पानी देकर तो दिल्ली को चमका दिया । लेकिन सरकारी खजाना खाली कर दिया। सबको समझना चाहिए कि देश टैक्स से चलता है लुभावने वादे कब तक चलते रहेंगी ।

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