हिंदी दिवस विशेष : डिजिटल युग में बढ़ता हिंदी का प्रभाव

विनोद कुमार
हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। उत्तर भारत के कई राज्यों को हिंदी पट्टी का राज्य कहा जाता है। समय समय पर हिंदी को लेकर कई सवाल भी खड़े होते रहते हैं। इसकी गुणवत्ता और इस पर आ रहे ख़तरों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं, साथ ही हिंदी को लेकर हमेशा से ही एक बड़ा सामाजिक विमर्श रहा है।

साभार – गूगल

विभिन्नताओ से भरे देश में अनेक भाषाएं बोली जाती है।सबका अपना महत्व ओर विस्तार क्षेत्र है। कहा भी जाता है कि हमारे यहां हर कुछ कोस के बाद भाषा और बोली का स्वाद बदल जाता है। सभी भाषा का अपना महत्व है। वैसे हिंदी को लेकर एक दौर वह भी था जब कहा जाता था कि हिंदी का पतन हो रहा है,लोग हिंदी में बोलना ओर पढ़ना पसंद नहीं कर रहे हैं। आज वो दौर है कि अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी से जोड़ कर बनाया जा रहा है। यह हिंदी की ताकत नहीं तो और क्या है। बड़ी-बड़ी कम्पनियां अब अपने अंग्रेजी के कंटेंट को हिंदी में ट्रांसलेट करवा रही है, इससे भी हिंदी के बढ़ते प्रभाव को समझा जा सकता है।

सूचना क्रांति से पहले साहित्यिक क्षेत्र में योगदान देने वालों की संख्या बहुत ही कम थी। गिने चुने लोग ही साहित्यिक कामों से जुड़े थे लेकिन सूचना क्रांति के बाद हिंदी के विकास को गति मिली। नये लोग ख़ास तौर पर युवा वर्ग हिंदी लेखन के कार्यों से जुड़ा रहा है, कुछ न कुछ लिख रहा है और इंटरनेट के माध्यम से उसे बहुतों तक पहुंचा रहा है। वर्ष 2020 तक आते आते हिंदी के डिजिटिलाइजेशन का स्वरूप व्यापक हुआ है। गूगल इस बात को लेकर आंकड़े पेश कर रहा है कि डिजिटल प्लेटफार्म पर हिंदी का भविष्य बाकी भाषाओं से अधिक उज्ज्वल है।

नये लेखकों, साहित्यकारों की जमात तेज़ी से बढ़ रही है।दिलचस्प है कि इस बीच हिंदी प्रकाशकों की गतिविधियां भी तेजी से बढ़ी है। पुस्तकों का लोकार्पण सिनेमाई अंदाज़ में होने लगा है। साहित्यिक दुनिया का जो बिक्री ओर बाज़ार का पक्ष कमज़ोर हो रहा था, अब वह अच्छा होता दिखाई दे रहा है। हिन्दी में समाज विज्ञान,सामाजिक मामले और राजनीति पर गंभीर पुस्तकें कम ही लिखी जाती है। इस कमी को अनुवाद के जरिए पूरा किया जा रहा है।

साभार- गूगल

हिंदी पुस्तकों का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है। हिंदी में लिखने वाले नए नए लेखक आ गए हैं, जिनकी पुस्तकें बड़ी तादाद में बिकने लगी है। वास्तव में इस समय हिंदी में जो नए पाठक आ रहे हैं, वे हिंदी के पारंपरिक पाठकों से भिन्न हैं। वे आमतौर पर हिंदी में अंग्रेजी जैसा साहित्य पढ़ना चाहते हैं।हिंदी में विभिन्न मामलों पर मौलिक पुस्तकें नहीं होने के कारण हाल के दिनों में हिन्दी के अनुवाद की अहमियत बढ़ी है।

हिंदी भाषा पर अंग्रेजी का संकट है। हर जगह इसका वर्चस्व बढ़ रहा है। हमें ज्यादा से ज्यादा हिंदी में बोलना ओर लिखना चाहिए ,जब तक हम सब मिल कर इसे बढ़ाने के लिये काम नहीं करेंगे तब तक इसका नुकसान ही होगा तब तक भाषा का संकट को लेकर सवाल बना रहेगा।

वर्तमान समय में डिजिटल लेखन ने तेज गति पकड़ी है, जो हिंदी को उसके उचित मुक़ाम तक पहुचाने के लिये एक अच्छी शुरुआत कही जा सकती है, लेकिन आने वाले कुछ सालों में यह कैसे प्रगति करता है, यह देखना दिलचस्प होगा और यही हिंदी के भविष्य को तय करेगा।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व छात्र हैं और न्यूज एजेंसी यूएनआई में काम कर चुके हैं।)

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