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क्या आपको पता है भविष्य में होने वाले युद्धों की दिशा व दशा तय करेंगे ड्रोन, भारत कितना तैयार?

छोटे आकार के ड्रोन आपात स्थितियों में दुर्गम क्षेत्रों में चिकित्सा एवं खाद्य सामग्री के पैकेट पहुंचाने में बेशक उपयोगी हों, लेकिन आतंकवादी एवं उनके आका भी अपने नापाक इरादों की पूर्ति के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं। साफ है कि पाकिस्तान की समानांतर सत्ता ने जम्मू में भारतीय वायुसेना के अड्डे पर दोहरे हमलों के जरिये यही काम किया है। यह अलग बात है कि इन हमलों के पीछे पाकिस्तान की भूमिका के बारे में भारत ने अभी तक औपचारिक रूप से कुछ नहीं कहा है।  आखिर उन्होंने छोटे ड्रोन का उपयोग क्यों किया, जिसका पता लगाना आसान था?

दरअसल हमले का पैमाना छोटा होने के कारण अपना हाथ होने से इनकार करना आसान था। साथ ही, इन हमलों के जरिये आतंकियों ने खासकर जम्मू-कश्मीर में खतरे की आशंका को और बढ़ा दिया, जहां भारतीय सेना पहले से ही तनाव में है। इसके अलावा, चूंकि नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम अभी जारी है, ऐसे में, यह हमला पाकिस्तान के भीतर के कट्टरपंथियों द्वारा (जो जनरल बाजवा की शांति पहल का विरोध करते हैं) भारत में सक्रिय अपने गुर्गों और कश्मीर घाटी में उनसे सहानुभूति रखने वालों को यह बताने का एक प्रयास था कि पाकिस्तान की सेना ने उन्हें पूरी तरह से त्याग नहीं दिया है और घाटी में नई दिल्ली की किसी भी राजनीतिक पहल का पुरजोर विरोध किया जाएगा।

Do you know that drones will decide the direction and condition of future wars, how ready India is?

खास बात यह है कि गर्मियों के इन महीनों में पाक सेना आमतौर पर घुसपैठ पर नजर रखने वाले भारतीय सैनिकों का ध्यान भटकाने के लिए नियंत्रण रेखा के पार प्रशिक्षित और सशस्त्र आतंकवादियों को भारी गोला-बारूद के साथ भेजती है। लेकिन युद्धविराम के दौर में ड्रोन हमले अब नियंत्रण रेखा पर दूसरे क्षेत्र से घुसपैठ को सुविधाजनक बनाने के लिए भारतीय सेना का ध्यान भंग करेंगे। जम्मू हवाई अड्डे पर यह अपनी तरह का पहला हमला था, लेकिन आगे भी ऐसे हमले हुए, तो तनाव बढ़ सकता है। नियंत्रण रेखा के पार हथियारों की खेप पहुंचाने और पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार ड्रग्स भेजने के लिए पाकिस्तान 2020 के उत्तरार्ध से ही ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि इससे पहले उस पार से आए ड्रोनों को भारतीय सैनिकों ने देखने पर निष्प्रभावी भी किया है।

बात सिर्फ यही नहीं है कि भारत ड्रोन का आक्रामक इस्तेमाल नहीं करता, भारतीय सुरक्षा बलों के लिए चुनौती यह भी है कि हमलावर ड्रोन इतने छोटे हैं कि वे वायुसेना के अड्डे पर लगे रडार की पकड़ में नहीं आते। वे अक्सर पक्षियों की तरह गुजर जाते हैं। और चूंकि ड्रोन को बड़ा खतरा नहीं माना गया, इसलिए भारतीय प्रतिष्ठान पिछले युद्ध में जहाजों, विमानों एवं मिसाइलों के साथ तैयारी में लगा था और ड्रोन की उसने अनदेखी की। अगर उन्होंने आधुनिक युद्ध के तौर-तरीकों का अध्ययन किया होता, तो उन्हें मालूम चलता कि कम से कम पिछले एक दशक से यह स्पष्ट था कि भविष्य के संघर्षों में ड्रोन का अधिक इस्तेमाल होगा।

जनवरी 2018 में, 13 सशस्त्र, फिक्स्ड-विंग मानव रहित हवाई वाहनों के बेड़े ने (जिन्हें आमतौर पर ड्रोन के रूप में भी जाना जाता है) भूमध्य सागर स्थित टार्टस में रूसी नौसैनिक अड्डे पर हमला किया था। सतर्क रूसी सेना ने न केवल उन्हें खदेड़ दिया था, बल्कि उस साल उसने लगभग 47 ड्रोनों को मार गिराया था। चूंकि वे हमले सैन्य ठिकानों पर किए गए थे, इसलिए उनका मुंहतोड़ जवाब दिया गया था, लेकिन असैन्य ठिकानों पर ड्रोन हमलों का भीषण नतीजा सितंबर, 2019 में देखा गया। तब सऊदी अरब की अबकैक तेल रिफाइनरी पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए ड्रोन हमलों ने दुनिया को झकझोर दिया था। उस हमले ने तेल की कीमत बढ़ाने के साथ सैन्य विश्लेषकों को सैन्य एवं नागरिक ठिकानों पर हमला करने वाले ड्रोनों के बेड़ों का मुकाबला करने के तरीके खोजने के लिए भी विवश किया।

अमेरिकी ड्रोन ने अफगानिस्तान में अपने 15 साल के सैन्य अभियान में अफगान-पाक क्षेत्र में अल कायदा और तालिबान के ठिकानों के खिलाफ सैकड़ों  हमले किए। आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच का हालिया युद्ध ड्रोन के जरिये ही जीता गया था। तब पाक सैन्य पर्यवेक्षक युद्ध के मैदानों के पास मौजूद थे-शायद तुर्की ने उन्हें सबक सीखने के लिए प्रेरित किया। और रिपोर्टें भी बताती हैं कि पाकिस्तान ड्रोन खरीदने के लिए तुर्की और इस्राइल की मदद ले रहा है, जैसे उसने कुछ वर्षों तक चीन की मदद ली, जो छोटे आकार के ड्रोन का सबसे बड़ा निर्माता है। खबरें हैं कि चीन ने भी अपने सैन्य एजेंडे के लिए या पाकिस्तान को ड्रोन का उपयोग करने देने के लिए इसका अध्ययन किया है,  ताकि चीन और पाकिस्तान के दो मोर्चों पर से भारत का ध्यान हटाया जा सके।

यह कहना जल्दबाजी होगा कि ड्रोन ही भविष्य के सभी युद्धों के नतीजे तय करेगा, क्योंकि ड्रोन शत्रु पक्ष को पहाड़ियों तथा सीमाओं पर सैनिकों के समूह पर हमला करने में तो मददगार हो सकते हैं, लेकिन अंततः शत्रु पक्ष को अपने सैनिकों को सामरिक रूप से कब्जे वाले इलाकों में कब्जे के लिए भेजने की आवश्यकता होगी, जैसे कि चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर करने की आवश्यकता होगी। यहां भारत की तरह एक प्रशिक्षित और दृढ़ निश्चयी सेना निश्चित रूप से अपनी पकड़ बना सकती है। खबरें बताती हैं कि भारत का रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ड्रोन और ड्रोन-विरोधी तकनीकों की दौड़ में स्पष्ट रूप से पीछे है।

कुछ अल्प विकसित प्रौद्योगिकियां भारत में जरूर हैं, पर पूरी सेना में ड्रोन विरोधी तकनीक के इस्तेमाल पर अमल में कुछ साल लग सकते हैं, क्योंकि इसके लिए बड़े यूएवी को इंटरसेप्ट करने के विपरीत छोटे ड्रोन का पता लगाने और इंटरसेप्ट करने की क्षमता की आवश्यकता होगी। अर्न्स्ट ऐंड यंग तथा फिक्की द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि ड्रोन सुरक्षा के लिए खतरा हैं, लिहाजा इनकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। लेकिन सरकार की सुस्त मशीनरी ने अभी तक उस सुझाव पर अमल नहीं किया है।

News Source- Amar Ujala

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